सीएम पशुधन निशुल्क दवा योजना में 637% तक महंगी खरीदी:दवा खरीद में 30 करोड़ का घोटाला, फिर भी 27 अफसरों को क्लीनचिट

पशुपालन विभाग में मुख्यमंत्री पशुधन निशुल्क दवा योजना में दवा खरीद में 29.48 करोड़ रु. की गड़बड़ी करने वाले 27 अफसरों-कर्मचारियों को उनके दोबारा जांच के आवेदन पर सीएम के वित्त विभाग ने ही बिना दस्तावेज व पत्रावलियां देखे, क्लीनचिट दे दी। सीएमओ व मुख्य सचिव 2 बार चार्जशीट देने के आदेश दे चुके हैं। 8 अफसर तो रिटायर्ड हो चुके हैं।
विधानसभा की जनलेखा समिति ने 2020 में व पशुपालन विभाग के प्रमुख शासन सचिव की अध्यक्षता में बनी दो कमेटी ने (2021 व 2022) माना था कि 2016-17 अफसरों ने 2 निजी फर्मों को फायदा देने के लिए 637% ऊंची दरों पर 54 करोड़ की दवाएं खरीदकर 30 करोड़ का घोटाला किया। जनवरी 2021 में अफसरों ने सीएमओ में आवेदन देकर दोबारा जांच की मांग की थी।
जिसके बाद पशुपालन विभाग शासन सचिव ने नई कमेटी बनाई। रिपोर्ट में लिखा कि अफसरों का दोबारा जांच का आवेदन असत्य व कार्रवाई से बचने मामले को लंबित रखने की मंशा से ओत-प्रोत है। जिन अफसरों को चार्जशीट दी जानी है, उनमें पशुपालन विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. भवानी सिंह अब राजस्थान पशुधन विकास बोर्ड के सीईओ हैं। विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. नरेंद्र मोहन सिंह का भी नाम हैं। पशुपालन निदेशक डॉ. अजय गुप्ता ने वीआरएस ले लिया।
मंत्री की रिपोर्ट पर शासन सचिव ने कहा-चार्जशीट दें : पशुपालन विभाग के मंत्री लालचंद कटारिया ने शासन सचिव को 1 जनवरी 2022 को वित्त विभाग की टिप्पणी के निर्देश दिए। इस पर तत्कालीन शासन सचिव आरुषी मलिक ने 10 फरवरी को रिपोर्ट भेज दी। इसमें लिखा कि जांच समिति ने 7 जून 2021 को रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है।
इसमें चार्जशीट देने व विभाग के अतिरिक्त अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिखा, लेकिन अभी तक किसी भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद 5 अप्रैल 2022 को सीएमओ संयुक्त निदेशक ने शासन सचिव को दोषी अधिकारियों को चार्जशीट देकर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे, लेकिन सवा महीना बीत जाने के बाद भी चार्जशीट नहीं दी गई।
3 साल में 3 जांचें, सभी में दोषी पाया गया


78 फर्माें ने किया था आवेदन, 2016-17 में खरीदी दवा : दवाइयां साल 2016-2017 यानी दो साल के लिए टेंडर प्रक्रिया से खरीदनी थी। टेंडर की अंतिम तारीख 31 मार्च 2015 थी, लेकिन प्रक्रिया को अंतिम तिथि से तीन दिन पहले 27 मार्च 2015 को शुरू किया गया। पूरी प्रक्रिया को 18 महीने का समय लगाकर बंद कर दिया गया। 78 फर्मों ने आवेदन किया था। जांच में क्रय शाखा व विभागाध्यक्ष को जिम्मेदार माना है। गुलाबचंद कटारिया की अध्यक्षता वाली जनलेखा समिति ने कहा कि टेंडर प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की गई, ताकि अत्यधिक उच्च दरों पर दवाएं खरीदी जा सके। दवाओं की संख्या भी बढ़ाई गई। इससे सरकार को 29.48 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
टेंडर में देर पर समिति सदस्य उत्तरदायी नहीं-वित्त विभाग: वित्त विभाग की 21 जनवरी 2022 की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसमें लिखा कि स्थाई क्रय-विक्रय समिति सदस्य मुख्य लेखाधिकारी रमेश सांखला, शासन सचिव एनएल गुप्ता, निदेशक अजय कुमार गुप्ता, संयुक्त निदेशक डॉ. मुकेश सक्सेना, अतिरिक्त निदेशक डॉ. जीआर चौहान, अतिरिक्त निदेशक डॉ. एनएमसिंह, केके पारीक, उपनिदेशक डॉ. तेजसिंह व सहायक औषधि नियंत्रक जयपुर डॉ. मनोज त्रिपाठी देरी से प्रकरण प्रशासनिक विभाग को प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी नहीं है। विभाग ने समय पर टेंडर प्रक्रिया समय पर पूरी की। स्थाई क्रय समिति सदस्य विलंब के लिए उत्तरदायी नहीं है।
इन अधिकारियों को दी जानी है चार्जशीट...
पशुपालन विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. भवानी सिंह, दवा प्रकोष्ठ के अतिरिक्त निदेशक डाॅ. एनएमसिंह, प्रयोगशाला उपनिदेशक डॉ. सीमा मिढढा, उपनिदेशक डॉ. हमेंद्र शर्मा, एसवीओ डॉ. लवकुमार गोरसी, डॉ. लेनिन भट्ट, एसवीओ डॉ. रमेश चौधरी, कुक्कुट उपनिदेशक डॉ. आशुतोष अरोड़ा, कनिष्ठ लिपिक पवन व्यास। जनलेखा समिति ने किया था खुलासा: दैनिक भास्कर के पास विधानसभा की जनलेखा समिति सहित सभी जांच रिपोर्ट मौजूद है। समिति ने 17 फरवरी 2020 को रिपोर्ट पेश की।
अफसरों ने दो बार टेंडर प्रक्रिया टाली। जिस वजह से 18 महीने तक यानी जुलाई 2015 से दिसंबर 2016 की अवधि तक कोई भी दर अस्तित्व में नहीं थी। इसका फायदा उठाते हुए कर्नाटक एन्टीबायोटिक्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड व बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड से 51.49 करोड़ रुपए की दवाएं 38 से 637% उच्ची दरों पर खरीदी गई। इनसे 149 प्रकार की दवाइयां व 40 सर्जिकल आर्टिकल खरीदे गए।
दोबारा जांच... जनलेखा समिति की रिपोर्ट सही
शासन सचिव ने सीएमओ को लिखा कि अफसरों की दोबारा जांच की मांग पर फिर जांच कमेटी बनाई। इसने माना कि दोबारा जांच का आवेदन मनगढ़त, असत्य व कार्रवाई से बचने के लिए मामले को लंबित बनाए रखने की मंशा से ओत-प्रोत है। जनलेखा समिति ने जांच रिपोर्ट में लिखा- अफसर कह रहे हैं कि बैड इंटेंशन नहीं था लेकिन सरकार के 30 करोड़ रु. लग गए। नजर अंदाज करके नहीं छोड़ सकते। कोई छोटी-मोटी बात तो समझ में आ सकती है। जिम्मेदारी तय करनी होगी।
वित्त विभाग ने दवा योजना में घोटाला करने वाले अफसरों को क्लीनचिट भले ही दी हो, हमने जांच रिपोर्ट जनलेखा समिति को दोबारा भेज दी है। आगे फैसला उसे ही करना है। चार्जशीट देने का फैसला भी समिति ही करेगी। -लालचंद कटारिया, पशुपालन मंत्री