60 हजार की रिश्वत लेते पकड़े गए गिरदावर से खुलेंगे फर्जीवाड़े के कई राज

Updated on February 10, 2019 Crime
60 हजार की रिश्वत लेते पकड़े गए गिरदावर से खुलेंगे फर्जीवाड़े के कई राज , Banswara "मालिक की मौत के बाद भी जमीन बिकती रही फर्जी नामांतरण खोलने के लिए मांगी थी रिश्वत "

मालिक की मौत के बाद भी जमीन बिकती रही फर्जी नामांतरण खोलने के लिए मांगी थी रिश्वत  
बड़ा सवाल : आखिर म्यूटेशन नहीं खुल सकता था तो फिर गिरदावर कैसे खोलता?  

गिरदावर रमेश गामोट के ट्रैप होने के बाद उपखंड में फर्जी रजिस्ट्री और म्यूटेशन के नाम पर लाखों के गबन का सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। रिश्वतखोर गिरदावर ने जिस जमीन का म्यूटेशन खोलने के लिए 60 हजार की रिश्वत ली थी दरअसल, वह म्यूटेशन खुल ही नहीं सकता था। क्यूंकि वो जमीन किसी और के खाते में दर्ज है। लेकिन, गिरदावर को फर्जी तरीके से म्यूटेशन खोलने के लिए रिश्वत की पेशकश की गई थी।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या फरियादी राजेंद्र यह बात जानता था कि यह म्यूटेशन नहीं खुल सकता? और साथ ही क्या वह जानते हुए भी ऐसा करना चाहता था?  क्या इतना बड़ा फर्जीवाड़ा बिना तहसीलदार और पटवारी की जानकारी के संभव था? यह तमाम सवाल है जिन पर अब प्रशासन को जांच करानी चाहिए ताकि अगर वाकई में भू-माफिया और राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत है तो वह उजागर हो सके।

जिस जमीन का म्यूटेशन खोलने के लिए गिरदावर ट्रैप हुआ है वह परतापुर के बैड़वा गाव की भूमी संख्या 2256 है। जिसका नम्बर 1867 रकबा 0.12 एयर भूमि गांव के ही ताजु पुत्र गेबा के नाम दर्ज थी। साल 1988 में परतापुर निवासी शब्बीर हुसैन पुत्र अब्दुल हुसैन टाकीवाला, मोहम्मद हुसैन पुत्र तैयब अली आजाद और फिदा हुसैन ने कलेक्टर बांसवाड़ा के 8 जुलाई, 1988 को जारी हुए आदेश एफ 21 राज. 86/1983-85 और 1 मार्च, 1988 के 2 /एफ/ 573 से 75 द्वारा कृषि से आबादी करवाकर अपने नाम रजिस्ट्री करा ली। बाद में पंचायत की स्वीकृति लेकर जमीन की चारदीवारी भी बनवा ली गई। इस बीच तापु की मृत्युु हो गई। जिससे इस जमीन का म्यूटेशन नहीं खुलने के कारण रिकॉर्ड में ताजु का नाम रह गया। इसका फायदा उठा कर इस जमीन को ताजू के बेटे बापू ने डडुका की पूर्व सरपंच रेखा देवी के नाम रजिस्ट्री करा दी। रेखा देवी के पति राजेन्द्र महावाई ने यह जमीन मंजु बानणिया को बेच दी। तहसील कार्यालय में तहसीलदार, गिरदावर और पटवारी सभी जानते थे कि इस जमीन का म्यूटेशन नहीं खुल सकता है। इस लिए फर्जी म्यूटेशन खोलने की एवज में गिरदावर ने इतनी बड़ी रिश्वत मांगी थी। फरियादी राजेन्द्र को मालूम था कि इस जमीन की पूर्व में किसी ओर के नाम रजिस्ट्री हो चुकी है इसके बाद उसने खरीद कर अन्य को बेची है। इसलिए गिरदावर के डेढ़ लाख मांगने पर 60 हजार देने को राजी हो गया।  
 

इधर, गिरदावर को भी इस पूरे मामले का पता था इसलिए फर्जी तरीके से काम कराने पर वह जानता था कि वह जो मांगेगा वह मिल जाएगा।

यह जमीन पूर्व में शब्बीर हुसैन और सहयोगियों ने खरीद रखी थी। इसका सिर्फ म्यूटेशन नहीं खुला था। इसकी शब्बीर और बाकि भू मालिकों कई बार तहसीलदार और उपखंड अधिकारी को लिखा है कि जमीन की हमारे नाम रजिस्ट्री है और विभागीय कमजोरी के कारण म्यूटेशन नहीं खोला है इसलिए ताजु के पुत्र ने किसी ओर को बेच दी है। इस पर उपखंड अधिकारी के नोटिस पर क्रमांक राजस्व 2015/ 146 पर मार्च, 2015 को तत्कालीन तहसीलदार ने उपखंड अधिकारी को नोटिस का जवाब दिया था। जोकि, पूरे मामले में सिस्टम पर ही सवाल खड़ा रही है। नोटिस में जवाब दिया गया था कि कलेक्टर के आदेशानुसार शब्बीर हुसैन पुत्र अब्दुल हुसैन टाकीवाला, मोहम्मद हुसैन पुत्र तैयब अली आजाद और फिदा हुसैन को बेच कर इनके नाम रजिस्ट्री हो चुकी है। वर्तमान में इन्होंने बाउंड्री कर ली है। उक्त भूमि का आबादी रूपांतरण होने के उपरान्त राजस्व रिकार्ड में अमल दरामद नहीं हुआ। जिस वजह से रिकार्ड में कृषि के रूप में खातेदार के नाम दर्ज रह गई। खातेदार ताजु की मृत्यु के बाद उसके बेटे बापू के नाम दर्ज हो गई। बापू ने जमीन को अन्य व्यक्ति को बेच देने से क्रेता अपने हक से वंचित रह गया है। इतना ही नहीं 1 फरवरी को पत्र क्रमांक 306 के तहत उपखंड अधिकारी ने तहसीलदार को इस मामले की सुनवाई के लिए आदेश दिया है। जब इतना सब, सबको मालूम होने के बाद भी इस जमीन की अन्य के नाम रजिस्ट्री करना और इसके म्यूटेशन खोलने के नाम पर वसूली करना कई सवाल खड़े करता है। तहसीलदार गोपाललाल बंजारा से इस संबंध में संपर्क करना चाहा लेकिन वह कार्यालय में नहीं आए और उनके निवास स्थान पर ताला लगा था। कॉल किया लेकिन रिसीव नहीं किया। 



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