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डडूका मे मुनि विकसन्त सागर महाराज द्वारा पर्युषण सी धर्म प्रभावना

Banswara
डडूका मे मुनि विकसन्त सागर महाराज द्वारा पर्युषण सी धर्म प्रभावना

पार्श्वनाथ जिनालय डडूका मे विराजित मुनिद्वारा शीत कालीन वांचना के तहत अभूतपूर्व धर्म प्रभावना की जा रही है. 

समाज के अजीत कोठिया  ने बताया कि  बुधवारको प्रातः कालीन प्रवचनों मे मुनि विकसंत सागर ने कहा की यश कीर्ति पूण्य प्रकृति से ही मिलती है. हित मीत प्रिय वचन वाले शास्त्रों को पढना सम्यक दृष्टि का काम हैँ. जिन शासन नाम की की नहीं गुणों की पूजा करता हैँ. जैन दर्शन मे सर्वज्ञ, वीतरागी व हितोपदेशी कीही पूजा की जाती है. सच्चा गुरु उसे ही कहा है जो पिच्छी कमंडल धारी हो एवं नग्न हो. जैन दर्शन ने विभिन्न परमेष्ठियों केलिए मूलगुणों की संख्या निर्धारित की हुई हैँ. अरिहंत के 46, सिद्ध के 8, आचार्य के 36, उपाध्याय के 25, व साधु के 28मूलगुण होते हैँ. मुनि श्री ने कहा की नमस्कार में ही चमत्कार पैदा करदो, यही सच्ची श्रद्धा हैँ. उन्होंने श्रावकों से कहा की जो समय की सीमा मे रहता हैँ, समय उसकी रक्षा करता हैँ. संत समागम और हरि भजन को जगमे दुर्लभ बताते हुए मुनि ने सभी से गुरुओ पर सच्ची श्रृद्धा रखने आव्हान किया. सम्यक दर्शन पर सारगर्भित चर्चा करते हुए मुनि ने कहा की सम्यक दर्शन के आठ अंग होते हैँ और उन सभी का पालन अनिवार्य होता हैँ. सात तत्वों, छह  द्रव्यों, पांच अस्तिकाय व नव पदार्थो पर श्रद्धा सम्यक दर्शन का पालन हैँ. श्रावकों को मुनि ने अंजन चोर की कथा सुना यह बताया की किस तरह गुरु के वचनों पर श्रद्धा ने उसे अंजन से निरंजन बना दिया. 

इस अवसर पर गांव की पांच बहनो द्वारा मुनि सुधा सागरजी के 37वे दीक्षा दिवस पर 37 तत्वार्थ सूत्र का हस्त लिखित शास्त्र प्रदर्शित किया गया. सभा का संचालनं राजेंद्र कोठिया ने किया, आभार राकेश शाह ने व्यक्त किया.

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