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56 किलों का सोना 56 साल बाद सरकार का, तत्कालीन प्रधानमंत्री शास्त्री को तोलने के लिए जमा कराया था 30 करोड़ का सोना

Banswara
56 किलों का सोना 56 साल बाद सरकार का, तत्कालीन प्रधानमंत्री शास्त्री को तोलने के लिए जमा कराया था 30 करोड़ का सोना
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- उदयपुर मालखाने में डबललॉक में बंद है 56 किलो 863 ग्राम सोना 

उदयपुर. तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को सोने से तोलने के लिए सरकार को जमा करवाया 56 किलो 863 ग्राम सोना सरकार को सुपुर्द करने के खिलाफ पेश निगरानी याचिका के प्रार्थना पत्र को न्यायालय ने खारिज कर दिया। 56 साल बाद 56 किलो सोना सरकार हो गया। यह सीजीएसटी चित्तौडगढ़़ के सुपुर्द किया जाएगा, सोना अभी उदयपुर कलक्ट्रेट के मालखाने में डबललॉक में बंद है। न्यायालय ने यह निर्णय गोमाना छोटीसादड़ी (प्रतापगढ़) निवासी गोवर्धनसिंह पुत्र गणपतलाल आंजना बनाम सहायक आयुक्त सीजीएसटी चित्तौडगढ़़ व अन्य के खिलाफ पेश निगरानी याचिका में दिया। न्यायालय ने हाइकोर्ट द्वारा 14 सितम्बर 2007 के दिए आदेश को बहाल रखा और कहा कि हाइकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप व विधिसम्मत नहीं है। --- यह था मामला गोमाना छोटीसादड़ी (प्रतापगढ़) निवासी निगरानीकर्ता के पिता गणपतलाल पुत्र भेरूलाल आंजना ने 16 दिसम्बर, 1965 को तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को तोलने के लिए जिला कलक्टर चित्तौडगढ़़ को सोना सुपुर्द कर रसीद प्राप्त की गई लेकिन ताशकंद में प्रधानमंत्री शास्त्री का देहावसान हो जाने से उनको सोने से तोला नहीं जा सका था। उसके बाद सोने को लेकर आपराधिक कार्रवाई होने पर परीक्षण न्यायालय द्वारा धारा 406 व 420 के तहत मुलजिमान की दोषसिद्धी की गई। 11जनवरी, 1975 के द्वारा जब्तशुदा स्वर्ण को स्वर्ण नियंत्रण अधिकारी को प्रदान किए जाने का आदेश प्रदान किया। उक्त निर्णय के खिलाफ गणपतलाल आंजना तथा हीरालाल ने एडीजे उदयपुर के समक्ष क्रिमीनल अपील प्रस्तुत की गई, जिसमें एडीजे उदयपुर ने अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय 11 जनवरी 1975 के निर्णय की पुष्टि की गई। अपीलीय न्यायालय के उक्त निर्णय के खिलाफ अपील व निगरानी याचिका में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा अपने आदेश स्वर्ण नियंत्रण अधिकारी को सुपुर्द करने के आदेश यथावत रखे गए।--भारत सरकार को पक्षकार बनाने का भी प्रार्थना पत्र खारिज निगरानीकर्ता गोवर्धन सिंह ने निर्णय के दो दिन पहले भारत सरकार को भी वाद में पक्षकार बनाए जाने का प्रार्थना पत्र पेश किया था। बताया कि गोल्ड एक्ट भारत सरकार ने बनाया है। इस कारण भारत सरकार को भी निगरनी याचिका में आवश्यक रूप से पक्षकार बनाया जाना चाहिए। प्रार्थना पत्र पर भारत सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता प्रवीण खंडेलवाल ने विरोध किया। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि सीजीएसटी कमीश्नर भारत सरकार के प्रतिनिधि है। उदयपुर जिला न्यायालयों में पैरवी के लिए उन्हें स्थाई अधिवक्ता नियुक्त कर रखा है। ऐसी स्थिति में भारत सरकार को अलग से पक्षकार बनाए जाने की आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने इस प्रार्थना पत्र को भी खारिज कर दिया। 

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