मोहरम

18-09-2018 to 21-09-2018

Updated on September 18, 2018

Muharram - Mohram - मोहरम

मुस्लिम इस्लामी साल का पहला महीना है, इसी महीने की दसवी तारीख को योमे आशूरा कहते है, आम तोर पर इस दिन  को इमामे हुसैन की शहादत के लिए जाना जाता है, पर हकीकत यह है कि इमामे हुसैन की शहादत से हज़ारों साल पहले ही से यह दिन अल्लाह पाक के नज़दीक अहमियत, का हामिल है, दुनियाँ की बड़ी-बड़ी घटनाये वा कियांत इसी रोज रुनुमा हुवे है चाहे वह अम्बियां किराम [पैग़ामबराम] के मोजजात हो, या कायनात की तख़लीफ़ (रचना) से मुतल्लिख हो, लेकिन शहादते हुसैन वह क़यामत खेज घटना है, जिसको कोई ईमान वाला भुला नहीं सकता, ६१ सन हिज़री में सरकार इमामे हुसैन को अपने वतन से दूर भूखा और प्यासा बच्चों और खानदान के शहजादों के साथ न हक़ शहीद किया गया, यह जंग कोई तखत या कुर्सी या असरों रुसुक की नहीं थी याग हक़ और बाहिल  (सत्य और आस्था) की लड़ाई थी, रसूले पाक स.अ.व.स के सहाबी हज़रात आमिर मुआवियह के इन्तिकाल के बाद उनका बीटा यजीद आवाम की मर्जी के बिना जबरदस्ती तखत पर काबिज होकर खलीफा बन बैठा, यजीद चूँकि फ़ासिक़, फजीर् थ. दीने इस्लाम के नियमों व सिद्धांतों का उलंघन करने वाला और शरई कानून का खुले आम धज्जिया उड़ाने वाला था, इस लिए वह खलीफा बननेke लायक नहीं था खलीफा की जिम्मेदारी होती थी की खुद सहीं राह पर चलकर आवाम को सहीं राह पर चलाये, यजीद खुद गुमराह था, इसलिए इम्मामे हुसैन ने उसको खालिफ तस्लीम नहीं किया, यजीद  की अवैध हरकतों की रोक थम के लिए हुसैन का खलीफा न मानना उचित कदम था. क्योंकि इमामे हुसैन का यजीद को खलीफा तस्लीम करना यजीद की अवैध हरकतों की वैधानियत का प्रमाण बन जाता। सरकार इमामे हुसैन को अपने वतन से निकला गया, भूखा प्यासा रखा गया।  उनके नज़रों के सामने, भाइयों, भतीजों, भानजों, बेटों, दोस्तों को शहीद किया गया, लेकिन इमामे हुसैन सब्र (धैर्य) का दामन थामे रहे, अन्यथा जुलम अपराध फिसको फुजुर के खातिये के लिए सरकारे हुसैन ने इस्लाम के अमन-चमन को अपने खून से सेराब किया और जुलम के आगे सब्र करते रहे अपने नाना के दीन(इस्लाम) की रक्षा के लिए हर क़ुरबानी देने में उन्हें फख्र महसूस होता था, आखरी डैम तक हुसैन का यह नारा था की

जो जान मांगोगे तो जान देंगे.
जो मॉल मांगोगे तो मॉल देंगे.
मगर हम से यह हरगिज न होगा की नबी का 
जहॉ जलाल देंगे. 

इमाम हुसैन का पैगाम

इस्लाम अमन का महजब है सब्र की तालीम देता है, हुसैन ने हर हल में सब्र किया और सच्चाई पे कायम रहे. 

इमामे हुसैन शहीद होकर भी मोमिनित के दिलों के शहंशाह और फातिह हो गए और यजीद जंग जीत कर भी हर गाय. क्यूंकि जीत सच्चाई (हक़) की होती है. बुराई के खिलाफ आवाज उठाओं हर मुसीबत कठिनाई पे सब्र करो अमन और शांति के साथ मिलकर एकता के साथ दुश्मनों के जुलम और ज्यादती का मुकाबला करो.

यह शहीदे आजम शहनशाहे करबला का पैगाम है. 

जानकारी 
मौलाना अहमद खा  सिंधी
इमाम सा. जामा मस्जिद बांसवाड़ा 
Mobile 8003480329 

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