जलझुलनी (देवझूलनी) एकादशी

20-09-2018

Updated on September 19, 2018

रामरेवाड़ी (Ram Rewadi)

भारतीय पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष हर माह शुक्ल ग्यारस आती है पर भाद्रपद मास में आने वाली शुक्ल ग्यारस को जलझुलनी (देवझूलनी) ग्यारस कहते है.

 

माना जाता है की यह उत्सव आराम कर रहे विष्णु भगवान् को ताजा बरसात के पानी से नहलाने की रस्म पूरी करने से है. भगवान् इस दिन करवट लेते है, इस दिन परिवर्तन चालू होता है, इसलिए इसे परिवर्तन का दिन भी कहाँ जाता है. इसी के साथ एक कारण यह माना जाता है, की भगवान् विष्णु जब चार महीने राजा बलि के वहां पहरेदारी करने जाते है तो राजा बलि उन्हें सम्मान के साथ स्नान कराकर ले जाते है. इस अवसर पर शहर के मन्दिरों और मठों में भगवान का मनोहारी श्रृंगार किया जाता है.

 

इस दिन विष्णु अनुष्ठान, कथाश्रवण व उपवास के साथ ही श्रद्धालु दान-पुण्य करते है. और शहर के विभिन्न मन्दिरों से परम्परागत रामरेवाड़ियाँ जयकारों के साथ निकाली जाती है, जो शहर के मुख्य मार्ग आज़ाद चोक, पिपली चोक, धनलक्ष्मी चोक मार्किट, नगरवाडा, भारवचोक, त्रिपोलिया रोड, तेलियों की पिपली, पृथ्वीगंज फिर राजतालाब की पाल पर एकत्रित होती है राजतालाब क्षेत्र में इस अवसर पर ग्यारस का परंपरागत मेला भरता है, यह तेजाजी का मेला होता है जो की एक दिन पूर्व ही लग जाता है, यहाँ कई दुकाने और झूले लगते है. मेलास्थल पर ग्यारस के उपवास की वजह से फलाहार की कई दुकानें लगती है, जहां व्रती नर-नारियों का जमघट लगा रहता है. मेला स्थल पर भगवान की पूजा-अर्चना और आरती होती है, और भक्तजन पूरी आस्था के साथ भगवान की सेवा करते है. परम्परागत पूजा-अर्चना के बाद सभी रामरेवाड़ियाँ वापस भजन-कीर्तनों की गूंज व सैकडों भक्तों के साथ गोरख इमली, कालिका माता, महालक्ष्मी चोक होते हुवे अपने-अपने धाम पहुँचती है. भगवान की पालकियां मन्दिर पहुंचने के बाद भक्तजन पूरी भक्तिभाव के साथ उनकी अगवानी की और अनुष्ठानों के बाद आरती करते है. इन्ही राम रेवाडियों में शहर के सभी आखाड़े ( लालीवाव अखाडा, वनेश्वर अखाडा, खोड़ीयाल माता अखाडा, पवनपुत्र बाबा बस्ती अखाडा, मारुती अखाडा, पाण्डव व्यायाम शाला व कलिका माता अखाडा). सम्मिलित होते है, इसमें अखाडों के पहलवान अपने-अपने दल और भगवान हनुमानजी की प्रतिमा या तस्वीर के साथ जुलूस के साथ निकलते है. ये अखाडों के दल शहर भर में साहसिक करतबों और शक्ति का प्रदर्शन करते है, और इस प्रकार दाव, पेच दिखाते है और साथ में यह भी बताते है की अपनी आत्मा रक्षा केसे की जा सके. और इस प्रकार अपने साहस का परिचय देते है. इनके इन करतब से शहरवासी को आश्चर्यचकित हो जाते है. इस अवसर पर निकली रामरेवाडयों के दर्शन तथा भगवान की झलक पाने के लिए रास्ते भर श्रद्धालुओं की भीड बनी रहती है. भक्तजन अपनी श्रद्धा के अनुसार फल, फूल, प्रसाद, धार्मिक पुस्तक व अन्य सामग्री, दीप, कलश आदि प्रत्येक रवाडी में भगवान को समर्पित करते है, और श्रद्धा का इजहार करते है. और साथ ही अखाड़ों के द्वारा बताये जाने वाले करतबों को देखने के लिए लोगो की बहुत भीड़ लगती है. इस शोभायात्रा की शुरुआत माना जाता है की बाँसवाड़ा शहर में सन1900 के लगभग समय में राम रेवाड़ियाँ निकलना शुरू हुई. उस समयकाल में यहाँ रजवाड़ों (दरबार) के पास 7 मन्दिर और शहर में 4 मन्दिर थे, और इन्ही मंदिरों के साथ इस शोभा यात्रा की शुरुआत हुई. यह शोभा यात्रा इन 7 मन्दिरों से भगवान् विष्णु की अवतारों की मूर्तियों को पालकी में बिठाकर शहर के विविध मार्गों से निकलकर नदी (इस समय के नए बस-स्टैंड के समीप ) में स्नान, पूजा अर्चना कराकर पुन: भगवान् को मंदिरों में विराजित किया जाता था. अब ये राम रेवाड़ियाँ बढ़कर 40-42 हो चुकी है. समयानुसार मार्ग में बदलाव हुवा और फिर कलेक्टर मोहन सिंह मेहता ने नया मार्ग सुझाया.

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