भगवान् परशुराम जयंती

07-05-2019

Updated on April 8, 2019

हर वर्ष भगवान परशुराम के जन्मोत्सव पर लिमथान में स्थित भगवान् परशुराम के जन्मोत्सव को बड़े धूम धाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन यहाँ पर मेला लगता है और दूर दूर से लोग यहाँ पर आते है।

भगवान परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया पर हुआ था इसलिए अक्षय तृतीया के दिन परशुराम जयंती मनाई जाती है.  भगवान परशुराम स्वयं भगवान विष्णु के अंशावतार हैं. वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर में उच्च के ग्रहों से युक्त मिथुन राशि पर राहु के स्थित रहते माता रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम का प्रादुर्भाव हुआ था . अक्षय तृतीया को भगवान परशुराम का जन्म माना जाता है. इस तिथि को प्रदोष व्यापिनी रूप में ग्रहण करना चाहिए क्योंकि भगवान परशुराम का प्राकट्य काल प्रदोष काल ही है।

भगवान परशुराम महर्षि जमदग्नि के पुत्र थे. पुत्रोत्पत्ति के निमित्त इनकी माता तथा विश्वामित्र जी की माता को प्रसाद मिला था जो देव शास्त्र द्वारा आपस में बदल गया था . इससे रेणुका का पुत्र परशुराम जी ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे जबकि विश्वामित्र जी क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर भी ब्रह्मर्षि हो गए . जिस समय इनका अवतार हुआ था उस समय पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं का बाहुल्य हो गया था . उन्ही में से एक  राजा ने उनके पिता जमदग्नि का वध कर दिया था, जिससे क्रुद्ध होकर इन्होंने 21 बार दुष्टों राजाओं से पृथ्वी को मुक्त किया. भगवान शिव के दिए हुए परशु अर्थात फरसे को धारण करने के कारण इनका नाम परशुराम पड़ा .

आज के दिन व्रती नित्य- कर्म से निवृत्त हो प्रातः स्नान करके सूर्यास्त तक मौन रहे और स्नान करके भगवान परशुराम की मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करें तथा रात्रि जागरण कर इस व्रत में श्री राम-मंत्र का जप करना  सर्वश्रेष्ठ होता है . ऐसा करने से पुण्य का भागी बना जा सकता है.

परशुराम कुंड 

परशुराम कुंड (Parshuram kund), लोहित जिला, अरुणाचल प्रदेश – एसी मान्यता है, कि इस कुंड में अपनी माता का वध करने के बाद परशुराम ने यहाँ स्नान कर अपने पाप का प्रायश्चित किया था.

माता-पिता के प्रति समर्पण, जिसके लिए उन्होंने अपनी माता का वध किया था:
परशुराम वीरता के साक्षात उदाहरण थे. वे अपने माता–पिता के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे. एक बार परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका पर क्रोधित हुए. रेणुका एक बार मिट्टी के घड़े को लेकर पानी भरने नदी किनारे गयी, किन्तु नदी किनारे कुछ देवताओं के आने से उन्हें आश्रम लौटने में देरी हो गयी. ऋषि जमदग्नि ने अपनी शक्ति से रेणुका के देर से आने का कारण जान लिया और वे उन पर अधिक क्रोधित हुए. उन्होने क्रोध में आ कर अपने सभी पुत्रों को बुला कर अपनी माता का वध करने की आज्ञा दी. किन्तु ऋषि के चारों पुत्र वासु, विस्वा वासु, बृहुध्यणु, ब्रूत्वकन्व ने अपनी माता के प्रति प्रेम भाव व्यक्त करते हुए, अपने पिता की आज्ञा को मानने से इंकार कर दिया. इससे ऋषि जमदग्नि ने क्रोधवश अपने सभी पुत्रों को पत्थर बनने का श्राप दे दिया. इसके बाद ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को अपनी माता का वध करने की आज्ञा दी. परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपना अस्त्र फरसा उठाया, और उनके चरणों में सिर नवाकर तुरंत ही अपनी माता रेणुका का वध कर दिया. इस पर जमदग्नि अपने पुत्र से संतुष्ट हुए एवं उन्होने परशुराम से मनचाहा वरदान मांगने को कहा. परशुराम ने बड़ी ही चतुराई एवं विवेक से अपनी माता रेणुका तथा अपने भाइयों के प्रेमवश हो कर सभी को पुनः जीवित करने का वरदान मांग लिया. उनके पिता ने उनके वरदान को पूर्ण करते हुए पत्नी रेणुका तथा चारों पुत्रों को फिर से नवजीवन प्रदान किया. ऋषि जमदग्नि अपने पुत्र परशुराम से बहुत प्रसन्न हुए. परशुराम ने अपने माता – पिता के प्रति अपने प्रेम एवं समर्पण की मिसाल कायम की.

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