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मानगढ के लिये पश्चाताप कब?

मानगढ के लिये पश्चाताप कब?

शालिनी पँड्या

13 अप्रेल 1919 को हुए जलियावाला बाद नरसंहार पर ब्रिटीश प्रधानमंत्री का अफसोस जाहिर करना हम सभी के हृदय को छू गया, ब्रिटीश सरकार को इस क्रुरता का निश्चित रुप से पश्चाताप होना चाहिये। यह अपराध अक्षम्य है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम  के इतिहास लेखन मे भारतीय साहस और संघर्ष को न्यायपूर्ण स्थान नही मिल पाया है। राजस्थान , बाँसवाड़ा का मानगढ धाम उनमे से एक एसा ही तीर्थ स्थल है जिसका वर्णन भारत के इतिहासकरों ने कहीं नहीं किया है।

जलियावाला बाग नरसंहार के छह वर्ष पूर्व मानगढ नामक पवित्र स्थान पर ब्रिटीश सरकार की दमनकारी नीतियों और सामाजिक कुरीतियों से लडने के लिये गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में 1500 भील एकत्रित हुए, भौगोलित आधार पर अगर उस स्थान का वर्णन किया जाये जो वो एक टेकरी कही जा सकती है जिसे चारों तरफ से घिरी हुई पहाड़ियों से अंग्रेजों ने घेर लिया था। बडी ही क्रुरता के साथ सभी “भगत लोगो“ पर अन्धाधुन गोली बारी की गयी, इस अन्धाधुन गोली बारी मे शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों का इतिहास मे कोई स्थान नही है और यही बात पीडादायक है।

गुरु गोबिंद के नेतृत्व मे वागड मे शुरु किया गया “भगत आँदोलन” सामाजिक चेतना का पर्याय बन गया था,सामाजिक चेतना और राष्ट्रीयता का भाव अंग्रेज सरकार की नींद उडाने के लिये काफी था। सामाजिक कुरूतियों से लडने को हमारा भील समाज दृढ सँकल्पित था, अंग्रेजों को इस संकल्प की आहट हो गयी थी, वे समझ गये थे कि मानगढ धाम अंग्रेज सरकार के पैर उखाडने की पुण्य स्थली बनने वाला है, जो समाज स्वयं के उत्थान के लिये कृत संकल्पित हो वो समाज अन्याय पूर्ण विदेशी शासन को सहन नही कर सकता है। 

”भुरेटिया नी मानोँ” का सँकल्प इन साहसी स्वतँत्रता सेनानियोँ का प्राण गीत बन गया।

इतिहास साक्षी है कि अंग्रेजों ने चुनचुनकर राष्ट्रीय विचारधारा के लोगो को मारा है, मानगढ धाम का यह संघर्ष भी यही प्रमाण देता है।

17 नवँबर 1913 को अन्ग्रेस्जों की इस बर्बर गोलीबारी मे मानगढ धाम को रक्तिम कर दिया।

आज स्वंतंत्रता  के 70 वर्षों के बाद जब ब्रिटेन का प्रधानमंत्री जलियावाला बाग के लिये क्षमा माँगता है, तो लगता है कि मानगढ धाम के हुतात्माओं के लिये पश्चाताप क्योँ नही? जालियाँवाला बाग मे हुए नृशंस हत्याकांड के लिये ब्रिटीश सरकार को वर्षोँ पूर्व ही माफी माँग लेनी थी लेकिन जो मानगढ मे हुआ वो भी एक अमानवीय भयानक नरसंहार था।

मानगढ के भगत आन्दोलन और गुरु गोबिंद के बारे मे भारत के इतिहास मे कहीं उल्लेख नही मिलता है, यह बात हृदय को कचोटती है, सामाजिक चेतना और सतंत्रता आन्दोलन के रुप मे भगत आन्दोलन को पूजनीय स्थआन मिलना चाहिये।

इतिहास लेखन मे मानगढ को जानबूझकर हटाया गया ताकि स्वतंत्रता आन्दोलन मे सामान्य भारतीय के असामान्य साहस को छिपाया जा सके ओर एक राजनीतिक विरासत का ही इस स्वतँत्रता सँग्राम के इतिहास पर एकाधिकार रहे, स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास गिने चुने लोगो के नाम और उनकी महिमा मंडन केआस पास सिमट कर रह गया है।

भारत की आने वाली पीढी को यह समझाना पडेगा कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम सामान्य नागरिकों के असामान्य साहस का परिचायक है। मानगढ जैसी पुण्यस्थली को इतिहास मे स्थान मिलना ही चाहिये।

जालियावाला बाग से छह वर्ष पूर्व हुए इस अमानवीय नरसंहार के लिये ब्रिटीश सरकार को क्षमा माँगनी होगी।

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